अहंकार पतन का द्वार
रावण जानता था की वो सीता के रूप में भगवती माँ महालक्ष्मी का हरण कर रहा है पर उसे तो सिर्फ जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु के हाथो मृत्यू को प्राप्त कर उनके परम धाम को पाना था । प्रख्यांड पण्डित महाज्ञानी चारों वेदों के ज्ञाता का अहंकार भी सिर्फ संसार को ये संदेश देने के लिये था की अपार धन समृधि होने के बाद अगर आप में विवेक की कमी है तो आपका मार्ग पतन की ओर है। सबसे बड़े अचरज की बात तो ये है कि जब अहंकार हावी होता है तो सबसे पहले बुद्धि और विवेक का ही नाश होता है। ज्ञान की ज्योती से ही अज्ञानता का अन्धकार मिट सकता है। पर ये ज्ञान की ज्योती भी परमात्मा की इच्छा से ही प्रज्वल्लीत होती है अन्यथा मानव परमात्मा के करीब रेह कर भी उसे पहचानने की योग्यता नही रख पाता ।
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